दावे की व्यावहारिकता
C1अधिवक्तानमस्कार, श्री सक्सेना। सरधना में अपने पड़ोसी के साथ आपका जो पत्र व्यवहार हुआ था, और पिछले साल दशहरे के दिनों में ग्राम पंचायत के सामने जो बयान दिए गए थे, वे सब मैंने देख लिए हैं। कुछ बातें मानहानि की श्रेणी में गिनी जा सकती हैं, फिर भी कोई ठोस मुआवज़ा मिलने की संभावना सीमित ही दिखती है।
मुवक्किलफिर भी मुझे लगता है कि हमें आगे बढ़ना ही चाहिए। दशहरा मेले में मेरे बर्ताव को लेकर जो आरोप लगाए गए, वे पूरी तरह बेबुनियाद थे, और उनकी वजह से यहाँ के कई ठेके मेरे हाथ से निकल गए।
अधिवक्तायह तर्क तो दिया ही जा सकता है कि वे बातें झूठी भी थीं और नुक़सान पहुँचाने वाली भी, और जिस मौक़े पर वे कही गईं उससे निजी दुश्मनी का संकेत भी मिलता है। पर आँकड़े सोचने पर मजबूर कर देते हैं। सबसे अनुकूल स्थिति में भी अदालत शायद एक लाख रुपये के आसपास ही हर्जाना दे, जबकि हमारा अपना ख़र्च, वरिष्ठ अधिवक्ता की फ़ीस मिलाकर, छह लाख रुपये तक पहुँच जाएगा।
मुवक्किलपर अगर हम जीत गए तो क्या दूसरा पक्ष यह ख़र्च नहीं भरेगा?
अधिवक्तासिद्धांत में हाँ, पर व्यवहार में उस पड़ोसी के पास अपने पुश्तैनी मकान के अलावा कुछ ख़ास संपत्ति है ही नहीं। वसूली में और समय तथा और साधन लगेंगे, और पूरी रक़म मिल ही जाएगी, इसकी कोई गारंटी भी नहीं। इसके अलावा मुक़दमे में आपके अपने बही खाते और आयकर रिटर्न भी सामने रखने पड़ेंगे, जिनसे उलटे दावे खड़े हो सकते हैं।
मुवक्किलयह सुनकर मन बैठ जाता है। तो क्या आप मुझे किसी भी तरह की कार्रवाई से मना कर रहे हैं?
अधिवक्ताबिलकुल नहीं। मैं यह कह रहा हूँ कि संभावित नतीजे और तयशुदा ख़र्च का पलड़ा मुक़दमेबाज़ी के ख़िलाफ़ काफ़ी झुका हुआ है। हमारी ओर से भेजा गया एक औपचारिक नोटिस शायद पूरी अदालती लागत उठाए बिना ही आपको माफ़ी दिला दे।
मुवक्किलऔर अगर उस नोटिस का कोई नतीजा न निकले?
अधिवक्तातब हम पड़ोसी का जवाब आने के बाद दोबारा सोचेंगे, पर तब भी मैं दावा दायर करने से मना ही करूँगा, जब तक कोई नया प्रमाण सामने न आ जाए जो संभावित हर्जाने को सचमुच बदल दे। यह प्रक्रिया तीन साल तक खिंच सकती है, और उतने समय में सरधना के आपसी संबंध और बिगड़ते ही जाएँगे।
मुवक्किलसमझ रहा हूँ। शायद मुझे यह मामला यहीं छोड़ देना चाहिए।
अधिवक्तायह फ़ैसला निस्संदेह आपका ही है। मैं सिर्फ़ यह पक्का कर लेना चाहता हूँ कि आप उस फ़र्क़ को अच्छी तरह समझ लें जो तकनीकी रूप से जीते जा सकने वाले मुक़दमे और उस मुक़दमे के बीच है जो लगने वाले पैसे और मन पर पड़ने वाले बोझ को सही ठहरा सके। नोटिस भेजने में कोई हर्ज नहीं है, और उसका जवाब आते ही हम दोनों के सामने तस्वीर कहीं साफ़ हो जाएगी।