बिना बोले मरम्मत
C1जब राहुल अपनी पुरानी रेसिंग साइकिल को गुरुवार की दोपहर करोल बाग में मीरा की छोटी सी वर्कशॉप में ले गया तो बारिश की बूंदें गिर रही थीं। उसने पहले से तीन अलग अलग तरीके सोच रखे थे जिससे वह नुकसान की बात बिना अपनी लापरवाही स्वीकार किए बता सके। साइकिल का फ्रेम पन्ने जैसे हरे रंग का था जो खिड़कियों से आती कम रोशनी में चमक रहा था। पीछे के पहिये के पास फ्रेम में हल्का सा झुकाव आ गया था। मीरा आमतौर पर ग्राहकों से ज्यादा बात नहीं करती थी। उसने साइकिल को ध्यान से देखा और धीरे से कहा कि लगता है टक्कर सीधी नहीं बल्कि तिरछी लगी थी। राहुल ने सोचा कि यह टिप्पणी कहानी सुनने का न्योता है या बस चुप्पी तोड़ने का तरीका।
मीरा थोड़ी देर के लिए पिछली कोठरी में गई और कैलिपर्स तथा एक छोटी नोटबुक लेकर लौटी जिसमें सिर्फ वह ही समझ सके ऐसे संकेत लिखे थे। अगले बीस मिनट तक उसने लगभग चुपचाप काम किया। बीच में वह माप लेती और कुछ अंक लिखती रहती। उसने मौसम या सप्ताहांत की बातें नहीं कीं बल्कि यह बताया कि पुराने स्टील फ्रेम में ऐसे झुकाव अक्सर वेल्डिंग वाले हिस्सों में कमजोरी दिखाते हैं। राहुल को लगा कि शायद उसकी साइकिल को सिर्फ सीधा करना काफी नहीं होगा।
राहुल ने पूछा कि क्या मरम्मत शनिवार सुबह तक हो सकती है। मीरा ने सिर थोड़ा झुकाया जो उसका सोचने का अंदाज था। उसने कहा कि पूरा प्रभावित हिस्सा बदलना बेहतर रहेगा क्योंकि इससे सवारी की मजबूती बनी रहती है। राहुल ने मंजूर कर लिया और राहत महसूस की कि मीरा ने उस नीची दीवार के बारे में कुछ नहीं पूछा जिसका अंदाजा वह दो शाम पहले लोधी गार्डन में गलत लगा बैठा था।
जब मीरा नया ट्यूबिंग तैयार करने लगी तो उसने कहा कि मूल रंग अब ठीक वैसा नहीं बनता। राहुल ने सिर हिलाया हालांकि पहले वह इन बातों पर ध्यान नहीं देता था। जब वह वर्कशॉप से निकला तो बारिश कम हो चुकी थी और स्ट्रीट लाइटें जलने लगी थीं। उसके पास पांच हजार रुपये से ज्यादा का बिल था और यह अहसास था कि मीरा घटना के बारे में उससे कहीं ज्यादा जान चुकी थी। अगले सोमवार जब वह साइकिल लेने गया तो फ्रेम लगभग वैसा ही दिख रहा था परंतु और मजबूत लग रहा था मानो मरम्मत ने शारीरिक नुकसान के साथ उसकी अनकही कहानी को भी समाहित कर लिया हो।