देरी की अनमोल सीख
C1मंगलवार की हल्की बूंदाबांदी वाली सुबह प्रिया अपनी आरक्षित सीट पर डब्बा छह में बैठ गई। अहमदाबाद जाने वाली इंटरसिटी ट्रेन मुंबई सेंट्रल से सुबह जल्दी खुल रही थी। उसने यह समय इसलिए चुना था ताकि वह शांति से अपनी टीम के लिए प्रस्ताव पूरा कर सके जिस पर मुंबई के सहकर्मी हफ्तों से चर्चा कर रहे थे। जैसे ही ट्रेन मुंबई सेंट्रल से रवाना हुई प्रिया ने सामने की सीट पर बैठे एक बुजुर्ग सज्जन को बार बार अपनी जेब घड़ी देखते देखा। गार्ड ने जल्दी ही घोषणा की कि वडोदरा के पास सिग्नल खराबी के कारण यात्रा में चालीस मिनट तक की देरी हो सकती है। कई यात्री जोर से आह भर उठे पर प्रिया ने इस देरी को अतिरिक्त समय का उपहार माना। उसने लैपटॉप खोला और ध्यान लगाकर टाइप करना शुरू किया।
सूरत पहुंचते पहुंचते बारिश थम चुकी थी और हल्की धूप खिड़कियों से अंदर आ रही थी। बुजुर्ग सज्जन जिनका नाम श्री रामप्रकाश वर्मा था प्रिया की स्क्रीन पर पड़ रही उसकी झुंझलाहट देखकर बात करने लगे। उन्होंने बताया कि वे सात साल बाद पहली बार अपनी पोती से मिलने जा रहे हैं और स्वास्थ्य कारणों से इस यात्रा को दो बार पहले टाल चुके हैं। प्रिया ध्यान से सुन रही थी क्योंकि उनके शब्दों में छिपा पछतावा साफ महसूस हो रहा था।
जैसे ही ट्रेन आणंद के करीब पहुंची ड्राइवर ने बताया कि उत्तर में हालात सुधरने से अब देरी केवल पच्चीस मिनट रह गई है। श्री रामप्रकाश वर्मा ने कहा कि ट्रेन की यात्राएं अक्सर लोगों की छिपी प्राथमिकताओं को किसी औपचारिक मुलाकात से ज्यादा खोलकर दिखा देती हैं। प्रिया मुस्कुरा दी क्योंकि उन्होंने अपने प्रस्ताव की छिपी जोखिमों को स्वीकार न करने की अपनी झिझक को भी पहचान लिया था।
जब ट्रेन अंततः अहमदाबाद स्टेशन पर सुबह ग्यारह बजे दस मिनट पर पहुंची तो प्रिया ने प्रस्ताव पूरा कर लिया था और दो अनुच्छेद ऐसे बदल दिए थे कि अब उसका सतर्क स्वर बिल्कुल सही लग रहा था। श्री रामप्रकाश वर्मा ने चुपचाप सिर हिलाकर शुभकामनाएं दीं जो उनके शब्दों से कहीं ज्यादा अर्थ रखती थीं। प्लेटफॉर्म पर उतरते हुए प्रिया को एहसास हुआ कि यात्रा ने उसे सिर्फ अतिरिक्त समय नहीं दिया बल्कि अजनबियों के बीच अनकही समझ की कीमत भी सिखा दी।