पुरानी तस्वीर
C1चाची के अव्यवस्थित अध्ययन कक्ष में रखे विरासत के बक्से को छाँटते हुए अमित को उन्नीसवीं सदी की कविताओं की एक पतली किताब मिली जिसके किनारे पीले पड़ चुके थे। दो सॉनेटों के बीच लगभग जानबूझकर छिपाई गई एक छोटी सीपिया तस्वीर रखी थी जो किताब के आकार में काटकर फिट की गई थी। तस्वीर में लगभग पैंतीस वर्ष की एक महिला लोहे के अलंकृत फाटक के पास खड़ी थी और उसका भाव काल की रूखी औपचारिकता के बजाय शांत मुस्कान वाला था। सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात पीछे की हल्की पेंसिल टिप्पणी थी जिसमें लिखा था राधा गलतफहमी से पहले उन्नीस सौ सत्तानवे।
अमित ने कभी चाची को इस नाम का जिक्र करते नहीं सुना था फिर भी लिखावट दादी के पत्रों जैसी थी। उत्सुक होकर उसने दोपहर शेष समय पारिवारिक पत्रों से तुलना करते हुए पता लगाया कि राधा चाची की सबसे घनिष्ठ सहेली थीं जब तक उन्नीस सौ अट्ठानवे के वसंत में किसी छिपी हुई विरासत को लेकर तीखा विवाद न हो गया जिसने उनके संबंधों को स्थायी रूप से तोड़ दिया। सावधानी से सुरक्षित किनारों और छिपे स्थान वाली तस्वीर से पता चलता था कि चाची ने मित्रता समाप्त होने के बाद भी स्मृति को महत्व दिया था।
अमित सोचने लगा कि क्या किताब कभी राधा की थी। सामने के आवरण के अंदर एक छोटी पुस्तक पट्टी पर केवल रा म अक्षर और उन्नीस सौ छियानवे की तारीख अंकित थी, जो तस्वीर से एक वर्ष पहले की थी। इस खोज ने उसे एक निजी मेलमिलाप की अनुभूति दी जो कभी साकार नहीं हुआ और वह नए ध्यान से सॉनेट पढ़ने लगा ताकि कोई संकेत पछतावे या शेष लगाव का मिल सके।
शाम तक तस्वीर को अम्ल मुक्त कागज की दो शीटों के बीच सावधानी से रख दिया गया पर अमित निश्चय नहीं कर पा रहे थे कि उसे मूल स्थान पर लौटाएँ या परिवार के इतिहास के नए टुकड़े के रूप में फ्रेम करें।